अंजाम
-- संजय बोरुडे
धधकते हुये दिलोंकी
अहमियत और कश्मकश
ललकार रही है ;
मानसिक प्रदुषनको ।
मै देख रहा हुं ;
मै देख रहा हुं ;
शहर कितने जलदीनमे है ।
उसे इतनी फुरसत कहा कि
वो देख सके;
गिलोतटीनपे कत्ल की गयी
छाटपटाती इन्सानियत
और प्रर्थानाघरोमे
दम तोडती हुई प्रर्थानाये ।
अब
शहर
बाद-दुआओकी
शिकस्तमे।
और
मै
देख राहा हू ;
इस मायुस,बेबस
शहरका दर्दनाक
| अंजाम .!!!! |
bahut umda likha hai,aage badho
जवाब देंहटाएंDARDNAK KAVITA....JIYO DR. BORUDE SIR
जवाब देंहटाएंbahut gaharaee se....
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंअंजाम बढिया
जवाब देंहटाएंअप्रतिम कविता
जवाब देंहटाएंkhup sundar
जवाब देंहटाएंबेहतर
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